प्याली में तूफान

प्याली में तूफान

एक ऐसा जाम जिसमें आजादख्याली की हाला भरी होगी। एक ऐसा मंच जिस पर उन्मुक्त विचारों के नग्मे गूजेंगे। जिस पर उड़ने के तलबगार पंछियों को बांधने के लिए कोई पिंजरा नहीं होगा। सुबह की उंगलियों में थमा गुनगुनी चाय का कप हो, ऑफिस की व्यस्तताओं में राहत देने वाला कॉफी का मग हो या किसी सुकरात के हाथों में धरा हलाहल का पैमाना, इन्हीं नन्ही प्यालियों में ही तो अक्सर सुकून के या बदलाव के तूफान छुपे होते हैं!

शशि शेखर
प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान

कॉफी हाउस

कॉफी हाउस

बातें और कॉफी गरमागरम ही अच्छी लगती हैं। ठंडी हो जाएं तो बेकार हो जाती हैं। पर इन दोनों से भूख मिटती नहीं बल्कि बढ़ती है। इसीलिए लोग कॉफी हाउस में लंबी-लंबी बातें करते हैं और कई -कई कप कॉफी पीते हैं। कभी निंदारस से शुरू होने वाली यह बातें क्रांति पर खत्म होती हैं तो कभी क्रांति से शुरू हो कर हाथापाई तक आ जाती हैं। पर उनका अपना मजा है। टीवी चैनलों ने कॉफी हाउसों को उजाड़ा है हम चाहें तो उन्हें फिर से बसा सकते हैं।।

अरुण कुमार त्रिपाठी
एसोशिएट एडीटर, हिन्दुस्तान

आओ कुछ बात करें

आओ कुछ बात करें

घटनाएं भी बहुत हैं। समस्याएं भी बहुत हैं। ढेर ढेर से विचार हैं हर घटना और समस्या के लिए। इसलिए हम शुरू कर सकते हैं बातों का एक ऐसा सिलसिला, जो शायद कभी न टूटे।

हरजिन्दर
एसोशिएट एडीटर, हिन्दुस्तान

सरे राह

सरे राह

कुछ जानकारी, ज्यादातर अज्ञान, कुछ गपबाज़ी, कुछ गलत मत-मतांतर, कुछ प्रासंगिक, कुछ अवांतर, तरह-तरह की बातें, फिल्में, राजनीति, खेल, अभिजात और सड़क की संस्कृति। इन सबके बारे में इन बातों के कोई सूत्र और इनका कोई अर्थ हो सकता है कि हो, और न भी तो क्या फर्क पड़ता है?

राजेन्द्र धोड़पकर
कार्टूनिस्ट व एसोशिएट एडीटर, हिन्दुस्तान

लव यू जिंदगी

लव यू जिंदगी

सिर्फ उनके लिए जो थोड़ा सा रूमानी हो जाने को तैयार हों। कुदरत, इंसान और चीजों से मुहब्बतों की बातें। इश्क, जुनून और लगन के सूफियाना किस्से। गजलों, कविताओं, रागों और फिल्मी गानों का नास्टेल्जिया। प्लेबैक सिंगरों, संगीतकारों, फिल्मकारों और कहानीकारों के नाम कुछ लव लेटर। एक महफिल - अपनी और आपकी फुर्सतों की जुगलबंदी के लिए।

संजय अभिज्ञान
एडिटर (न्यू मीडिया, फीचर्स और रिसर्च), हिन्दुस्तान, दिल्ली

हमलोग

हमलोग

कुछ खास। कुछ आम। यानी बातें उस अवाम की, जो जिंदगी की जद्दोजहद के बीच हंसते हुए भी रोता है और रोते हुए भी हंसता है। जाहिर है, उसके हंसने में हजार व्यथाएं हैं, तो रोने में हजार कथाएं। आइए, ऐसे ही ट्रेजडी, कॉमेडी, सटायर और सेंटिमेंट्स के जाने-अनजाने अफसानों से रू-ब-रू होते हैं हमलोग।

अकु श्रीवास्तव
सम्प्रति-वरिष्ठ स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, पटना

बेआवाज़

बेआवाज़

उन दलितों-मुस्लिमों की आवाज़, जिन्हें समाज जानता भी नहीं।

दिवाकर
उप स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, लखनऊ

तो सुन किस्सा, सारंगी!

तो सुन किस्सा, सारंगी!

एक सुवा था, शुक। और एक थी सारंगी। सारंगी ने शुक से कहा-ए सुवा, कोई कहानी सुना न! सुवा ने कहा- क्या कहानी कहूँ सारंगी, निर्बुद्धि राजा के तो किस्से ही किस्से हैं।…तो, आज हमारे देश का भी यही हाल है। क्या प्रजा, क्या राजा और क्या दरबारी, सबके किस्से ही किस्से हैं। अनंत किस्से। तो क्या चिट्ठा कहूँ? मगर कुछ तो कहते रहना होगा न! कहे-सुने बिना गति नहीं।

नवीन जोशी
एग्जक्यूटिव एडिटर, हिन्दुस्तान, लखनऊ

टेलिस्कोप

टेलिस्कोप

गली के नुक्कड़ की ब्रह्मांड यात्रा। दूर तक देखने वाली दूरबीन। इसमें दूर-दूर की बातें ज्यादा हैं, पास की कम। संदर्भ फिर भी अपनी गली का है।

प्रमोद जोशी

युवा पार्क

युवा पार्क

ब्लॉग बस्ती के इस बगीचे में आप पाएंगे लेखन की कुछ नई खुशबुएं। नई सोच के कुछ लोग जो घटनाओं पर भंवरों की तरह मंडराएंगे और उनकी गंध आप तक पहुंचाएंगे। मधुमक्खियों के इस दस्ते में सबके पास डंक हैं, लेकिन उनकी चुभन आपके लिए नहीं,  समाज के विलेनों के लिए होगी। आपके लिए तो वे बस शहद एकत्र करेंगे. . . ।  पेश हैं हिंदुस्तान परिवार के कुछ ऐसे उभरते लेखक जो कांटे चुभने पर सिस्टम को नहीं कोसते, बल्कि कलम उठाकर परिवर्तन सुझाने लगते हैं. . ।