प्याली में तूफान
एक ऐसा जाम जिसमें आजादख्याली की हाला भरी होगी। एक ऐसा मंच जिस पर उन्मुक्त विचारों के नग्मे गूजेंगे। जिस पर उड़ने के तलबगार पंछियों को बांधने के लिए कोई पिंजरा नहीं होगा। सुबह की उंगलियों में थमा गुनगुनी चाय का कप हो, ऑफिस की व्यस्तताओं में राहत देने वाला कॉफी का मग हो या किसी सुकरात के हाथों में धरा हलाहल का पैमाना, इन्हीं नन्ही प्यालियों में ही तो अक्सर सुकून के या बदलाव के तूफान छुपे होते हैं!
शशि शेखर
प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान
आंखिन लेखी
आते-जाते, घूमते-फिरते कई बार हम ऐसे दृश्यों से रू-ब-रू होते हैं, जिनसे मन द्रवित हो उठता है। मन करता है, तत्काल टीप लूं लेकिन जिंदगी की आपाधापी में वे क्षण पीछे छूटते जाते हैं। जब ब्लॉग लिखने का न्योता मिला तो लगा कि अब इस काम को और नहीं टालना चाहिए। इसीलिए नाम रखा है, आंखिन लेखी।
गोविंद सिंह
वरिष्ठ पत्रकार
आओ कुछ बात करें
घटनाएं भी बहुत हैं। समस्याएं भी बहुत हैं। ढेर ढेर से विचार हैं हर घटना और समस्या के लिए। इसलिए हम शुरू कर सकते हैं बातों का एक ऐसा सिलसिला, जो शायद कभी न टूटे।
हरजिन्दर
एसोशिएट एडीटर, हिन्दुस्तान
सरे राह
कुछ जानकारी, ज्यादातर अज्ञान, कुछ गपबाज़ी, कुछ गलत मत-मतांतर, कुछ प्रासंगिक, कुछ अवांतर, तरह-तरह की बातें, फिल्में, राजनीति, खेल, अभिजात और सड़क की संस्कृति। इन सबके बारे में इन बातों के कोई सूत्र और इनका कोई अर्थ हो सकता है कि हो, और न भी तो क्या फर्क पड़ता है?
राजेन्द्र धोड़पकर
कार्टूनिस्ट व एसोशिएट एडीटर, हिन्दुस्तान
हमलोग
कुछ खास। कुछ आम। यानी बातें उस अवाम की, जो जिंदगी की जद्दोजहद के बीच हंसते हुए भी रोता है और रोते हुए भी हंसता है। जाहिर है, उसके हंसने में हजार व्यथाएं हैं, तो रोने में हजार कथाएं। आइए, ऐसे ही ट्रेजडी, कॉमेडी, सटायर और सेंटिमेंट्स के जाने-अनजाने अफसानों से रू-ब-रू होते हैं हमलोग।
अकु श्रीवास्तव
कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना
बेआवाज़
उन दलितों-मुस्लिमों की आवाज़, जिन्हें समाज जानता भी नहीं।
दिवाकर
उप स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, लखनऊ
तो सुन किस्सा, सारंगी!
एक सुवा था, शुक। और एक थी सारंगी। सारंगी ने शुक से कहा-ए सुवा, कोई कहानी सुना न! सुवा ने कहा- क्या कहानी कहूँ सारंगी, निर्बुद्धि राजा के तो किस्से ही किस्से हैं।…तो, आज हमारे देश का भी यही हाल है। क्या प्रजा, क्या राजा और क्या दरबारी, सबके किस्से ही किस्से हैं। अनंत किस्से। तो क्या चिट्ठा कहूँ? मगर कुछ तो कहते रहना होगा न! कहे-सुने बिना गति नहीं।
नवीन जोशी
एग्जक्यूटिव एडिटर, हिन्दुस्तान, लखनऊ
युवा पार्क
ब्लॉग बस्ती के इस बगीचे में आप पाएंगे लेखन की कुछ नई खुशबुएं। नई सोच के कुछ लोग जो घटनाओं पर भंवरों की तरह मंडराएंगे और उनकी गंध आप तक पहुंचाएंगे। मधुमक्खियों के इस दस्ते में सबके पास डंक हैं, लेकिन उनकी चुभन आपके लिए नहीं, समाज के विलेनों के लिए होगी। आपके लिए तो वे बस शहद एकत्र करेंगे. . . । पेश हैं हिंदुस्तान परिवार के कुछ ऐसे उभरते लेखक जो कांटे चुभने पर सिस्टम को नहीं कोसते, बल्कि कलम उठाकर परिवर्तन सुझाने लगते हैं. . ।

