परिचय

दिवाकर
पूर्व उप स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, लखनऊ

बेवजह भटकना और वैसे लोगों के पहलू में वक्त गुजारना जिन्हें जिन्दगी और समाज में अपनी अहमियत ढूँढ़नी पड़ती है- सोचा न था एक दिन यह शगल प्रोफेशन बन जाएगा। 1984 में आज की चौखट पर पहुँचा और पत्रकार बन गया। इलस्ट्रेटेड वीकली, वीकएंड रिव्यू वगैरह में भी लिखता रहता था, सो टाइम्स ऑफ इंडिया में नौकरी लग गई। वहां जिस महीने बेस्ट स्टोरी का पुरस्कार मिला, उसके अगले ही महीने नौकरी जाने का फरमान। फिर थोड़े दिन ऑनलुकर के लिए भी काम किया। वापस हिन्दी में ही शरण मिली। नभाटा, स्वतंत्र भारत, अमर उजाला कारोबार, हिन्दुस्तान, अमर उजाला और आउटलुक साप्ताहिक होते-हवाते फिर ‘हिन्दुस्तान’ में हूं। चौथा सप्तक में शामिल राजेन्द्र किशोर और पत्रकार राजेन्द्र माथुर में गुरु, गाइड और फिलॉस्फर के अक्स पकड़ते-छोड़ते ‘न्यूज रूम’और ‘विचार रूम’ के गुलजार परकोटों पर 25 बरस गुजार लिए हैं। इस दौरान कलम ने कई विषय छुए, पकड़े और तजे। पर पता नहीं क्यों, खोपड़ी के ग्रे मैटर में एक चीज आकर अटकती रही कि इनसानों को दलित और मुसलमान कैसे बना दिया गया, क्यों बना दिया गया। बस, अपने भीतर के इसी कोलाहल को सुनना, गुनना और खयालों का ताना-बाना बुनना ताजा शगल में शुमार है। कभी शब्दों से उनकी मुलाकात होगी तो हाल आप भी जानेंगे।

अभी दो-तीन दिन पटना में था। पिछली बार तब गया था जब विधानसभा चुनाव में लालू परिवार की सत्ता विदा हो रही थी। तब कवरेज के लिए दिल्ली से पटना की यात्रा हवाई जहाज से की थी तो रास्ते में अंदाजा नहीं मिला था। इस दफा नितांत व्यक्तिगत काम से लखनऊ से ट्रेन में सवार हुआ और वह भी दिन में। [Read more]

अभी हाल में फैजाबाद गया था। ऑफिस के काम से। लखनऊ से फैजाबाद जाने के बीच रुदौली में है। यह फिलहाल फैजाबाद जिले का तहसील है। फिलहाल से मत चौंकिए। सरकार बदलती है, तो इसका जिला मुख्यालय भी बदल जाता है। मुलायम की सरकार हो तो यह बाराबंकी जिले में शामिल हो जाता है, मायावती आती हैं तो यह फैजाबाद जिले में चला जाता है। काफी पुराना कस्बा है यह। [Read more]

यह ब्लॉग दलित और मुस्लिम जीवन-मानसिकता आदि को लेकर है लेकिन इस बार इससे थोड़ा हटने की इजाजत चाहता हूं। दरअसल, मैं कनफ्यूज हो गया हूं और आपकी मदद चाहता हूं। मसला ही ऐसा है। गुस्सा भी है, संतोष भी लेकिन सबसे ज्यादा है तो भ्रम। मेरा छोटा बेटा पुणे में सिम्बायसिस का छात्र है। मैं उत्तर भारतीय हूं इसलिए वह भी यही है। उसकी मराठियों ने इसी कारण पिटाई कर दी। [Read more]

दिल्ली में मेरे एक दोस्त हैं डॉ. मंजूर आलम। जानने वाले अधिकतर लोग उन्हें डॉ. साहब कहते हैं। लेकिन वे मुझे अपना दोस्त नहीं मानते। उनका कहना है कि ‘आप दोस्त कैसे हो सकते हैं? आप तो हमारे भाई हैं।’ मंजूर साहब इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज के चेयरमैन हैं। इस इंस्टीट्यूट में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों से संबंधित राजनीति, अर्थशास्त्र, धर्म और संस्कृति केन्द्रित काफी अध्ययन हुआ है। सच्चर कमेटी पर काफी चर्चा होती है। [Read more]

मेरे एक मित्र हैं। ब्राह्मण हैं। (माफ करें, जाति इसलिए बतानी पड़ रही है क्योंकि आगे इसका संदर्भ है और इसके बिना बात बनती नहीं।) पत्रकार हैं। आम तौर पर जैसा कि चालीस पार के पत्रकारों के साथ होता है, वे आज की पत्रकारिता के तौर-तरीकों से परेशान हैं। जब उन्होंने पत्रकारिता ज्वाइन की थी तो उसके पीछे मकसद था सामाजिक क्रांति में भागीदारी। [Read more]