परिचय

अरुण कुमार त्रिपाठी
वरिष्ठ पत्रकार

लखनऊ की आबोहवा ने पहले कवि बनाया। बाद में पत्रकारों, साहित्यकारों, कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की शोहबत नें लेखक बना दिया। समाज और राजनीति पर अपनी प्रतिक्रिया जताने की बेताबी ने शिक्षा की धीमी रफ्तार से बाहर पत्रकारिता की तरफ मोड़ दिया। स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण में हाथ आजमाते हुए ‘जनसत्ता’ के दिल्ली संस्करण से जुड़ गए। तीन साल ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में भी खबरनवीसी की। इसके बाद ‘हिन्दुस्तान’ में एसोसिएट एडीटर के रूप में अपनी सेवाएं दी। राजकमल प्रकाशन के स्वर्ण जयंती वर्ष में ‘मेधा पाटकर’ और ‘कल्याण सिंह’ पर मोनोग्राफ लिख डाला। ‘कट्टरता के दौर में’ लेखों का संकलन भी बन गया। अभिव्यक्ति की लाइलाज बीमारी के चलते ब्लॉग पर आया।

राजनीति एक मनोरंजन है और मनोरंजन भी एक राजनीति है। इसे थोड़ा और फैला कर इस तरह कहा जा सकता है कि राजनीति दीर्घकालिक मनोरंजन है और मनोरंजन अल्पकालिक राजनीति है। लेकिन जो लोग राजनीति को जरूरत से ज्यादा गंभीर और सत्ता व धन कमाने के साथ जान लेने और जान देने का कर्म बना देना चाहते हैं उन्हें यह दोनों बातें खराब लगेंगी। वे चाहते होंगे कि राजनीति या तो हमेशा महात्मा गांधी का आमरण अनशन बनी रहे या लूटपाट और खून- खराबे का उपक्रम। [Read more]

राम मनोहर लोहिया इतिहास भी हैं और मिथक भी। वे राजनीतिज्ञ भी हैं और धर्मगुरु भी। वे दार्शनिक भी हैं और राजनीतिक कार्यकर्ता भी। सचमुच आज के समाजवादी नेताओं को देखकर यकीन नहीं होता कि उनके आंदोलन में कभी इतनी विलक्षण प्रतिभा रही होगी। जिस तरह वे राम, कृष्ण और शिव को भारतीय पूर्णता का स्वप्न मानते हैं उसी तरह उनको भी भारतीय समाजवाद का स्वप्न माना जा सकता है। [Read more]

डॉ लोहिया व्यक्ति स्वातंत्रय, समता और प्रेम के अनन्य उपासक थे। पर उनका यह भी मानना था कि स्वतंत्रता और समता के बिना प्रेम संभव नहीं है। इसलिए वे प्रेम की अनिवार्य शर्त के रूप में पहली दोनों स्थितियों को पैदा करना चाहते थे। अपने आदर्शों के समाज की स्थापना के लिए वे मौजूदा समाज की कमियों को चिह्नित करते थे और उन पर न सिर्फ अपने समय के अर्थशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय तर्कों से हमला करते थे, बल्कि इस काम में इतिहास और मिथक दोनों का सहारा लेते थे। [Read more]

इसे संयोग कहें या साजिश। दो हफ्ते पहले हमने ‘थ्री ईडियट्स’ देखी और अगले हफ्ते सचमुच हमसे ‘थ्री ईडियट्स’ मिल गए। तय हुआ कि किसी एक ईडियट के घर पर ही मिला जाए। लेकिन फिर इसलिए कार्यक्रम बदल दिया गया कि अगर मिलने पर तीस साल पुरानी भाषा-शैली की ताजगी नहीं रही तो मिलना किस काम का। इनमें तीन ईडियट तो दिल्ली में ही थे जो साल भर पहले किसी लेख के साथ मेरी फोटो छपने पर मिल गए थे। [Read more]

उत्तर प्रदेश परिवहन की बसों पर ड्राइवर की सीट के सामने लिखा हुआ है कि, ‘‘चालक पर तेज चलाने का दबाव न डालें।’’ अगर इसे बसों पर सबसे मोटे अक्षरों में लिखी इबारत यानी ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ के साथ मिलाकर पढ़ें तो लगेगा कि उत्तर प्रदेश सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए कितनी सतर्क है। कहते हैं राज्य परिवहन की बसों के ड्राइवर तेज चलाने, गलत ओवरटेक करने और साइड न देने के लिए बदनाम थे। [Read more]