परिचय

अकु श्रीवास्तव
पूर्व कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना

पत्रकारिता में तीस वर्षो से। 1980 से ‘दैनिक जागरण’ से कॅरियर की शुरुआत। नवभारत टाइम्स, राजस्थान पत्रिका, जनसत्ता और अमर उजाला में कई महत्वपूर्ण पदों पर। लखनऊ, जयपुर, चंडीगढ़, कोलकाता, मेरठ, जालंधर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना में काम। ‘अमर उजाला कॉम्पैक्ट’ वाराणसी और ‘हिन्दुस्तान’ चंडीगढ़ की लांचिंग। समसामयिक और ज्वलंत मुद्दों पर ‘हिन्दुस्तान’ में ‘हम लोग’ कॉलम का लेखन। समसामयिक और मनोविज्ञान से जुड़े विषयों पर नियमित लेखन।

पिछले हफ्ते कुछ करीबी मित्र पटना आए। पहली बार पटना क्या, बिहार में ही आए थे। जाहिर है, बिहार की (कु)ख्याति की जानकारी से सराबोर दो दिन तो उन्हें समझने में गए कि भाई स्थितियां बदल रही हैं, लोग बदल रहे हैं, वगैरह..। फिर बात आई घूमने पर, गोलघर? गांधी मैदान? गांधी सेतु.., ठीक है। सिखों के लिए प्रसिद्ध पटना साहिब गुरुद्वारा, जहां गुरु गोविंद सिंह ने जन्म लिया था, तो उन्हें जाना ही था। लेकिन, इससे आगे क्या? कुछ नहीं क्या? उनकी इस सोच का मेरे पास इक ही जवाब सूझ पड़ा, ‘किला हाउस’, जालान्स कलेक्शन। सन् 1541 के दौरान बिहार के शासक शेरशाह सूरी के किले की नींव पे तामीर इस भवन को गया के नवाब से आरके जालान ने खरीदा था। [Read more]

आज सचमुच मैं दिग्भ्रमित हूं। दिन में भी राह दिखायी नहीं दे रही। कहां जाऊं। कैसे जाऊं। क्या करूं। कुछ भी स्पष्ट नहीं है। आगे की सोचूं। पीछे को याद करूं या फिर सिर्फ आज पर भरोसा करूं? शायद पहली बार ऐसा महसूस हो रहा है कि असहाय भी हूं। मैं ही क्यों, पूरा देश असहाय-सा लग रहा है। कभी पवित्र गीता के झकझोर देने वाले श्लोक याद आते हैं तो कभी भगवान कहलाते-कहलाते ओशो बन गए रजनीश और उनके ही ऐसे लोगों के दर्शन। [Read more]

आरेफ़त की शराब है लखनऊ
इक शायर का ख्वाब है लखनऊ
दस्ते कु़दरत ने खुद लिखा जिसको
वो महकती किताब है लखनऊ
इस किताब का इक वर्क था मशहूर चौक बाजार। अफसानों में है कि किसी वक्त यहां हुस्न का बाजार था और तहज़ीब का बोलबाला। जिंदादिल लोगों की चहलकदमी से गली-कूचे गुलज़ार रहा करते थे। [Read more]

धर्मेद्र चला गया। उम्र रही होगी 12 साल। पिता चंद्रेश्वर चौहान को यह आशंका भी नहीं थी कि काफी मनौतियों के बाद उसके घर का चिराग बना धर्मेद्र अब नहीं है। चंद्रेश्वर बड़े आध्यात्मिक अंदाज में कहते हैं, ‘धर्मेद्र को तो जाना ही था। आखिर उसने हमारे परिवार में जन्म ही क्यों लिया? गरीब के घर पैदा होगा, तो ऐसे ही मरेगा और गरीब के मरने पर मातम कैसा?’ दस दिनों से धर्मेद्र के बुखार से लड़ रहे चंद्रेश्वर अपने बेटे को पटना के मेडिकल कॉलेज में लाते हैं और लौटकर वापस अपने घर नहीं, बल्कि बेटे को अपने हाथों में ही श्मशान घाट ले जाना पड़ता है। [Read more]