मेरे एक मित्र टेलीविजन की दुनिया में रुतबेदार पद पर आसीन हैं। पिछले दिनों वह लास वेगास गए थे। बड़े खुश लौटे। बोले- पहली बार वेगास में एक गोरे को हिन्दुस्तानी भिखमंगों की तर्ज पर भीख मांगते देखा। और तो और, इस बार कैसीनो सिटी के कमरों के भाड़े में बेहद कमी देखने को मिली। [Read more]
परिचय
हमारा देश कुछ ही हफ्तों में अपने प्रथम नागरिक का चयन करने जा रहा है, पर क्या यह त्रासद नहीं है कि इसमें आम मतदाता की कोई भूमिका नहीं? यह ठीक है कि राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका आम चुनावों से बिल्कुल अलग है, पर उन्हें चुनने वाले लोग तो जनता के वोटों से ही इस हक को हासिल करते हैं। क्या उन्हें अपने मतदाताओं की मंशा की कोई खबर या फिक्र है? [Read more]
वह 1984 में जाते नवंबर का सवेरा था। इलाहाबाद की कलेक्टरी के बाहर जनता का महाकुंभ उमड़ा पड़ रहा था। आजादी के बाद शायद ही ऐसा मौका कभी आया हो, जब हजारों लोग शासन और सत्ता के इस प्रतीक भवन के आसपास उमड़ पड़े हों। [Read more]
मत कहो आकाश में कोहरा घना है/यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। दुष्यंत की ये पंक्तियां केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु पर फिलवक्त पूरी तरह खरी उतरती हैं। कैसे? बताता हूं। [Read more]
अपने धमकी भरे अंदाज को कायम रखते हुए राज ठाकरे ने कदम वापस खींच लिए हैं और मुंबई में बिहार दिवस के आयोजन में अटकाए जा रहे रोड़े फिलहाल दूर हो गए हैं। तो मान लें कि यह एक अफसोसजनक फसाना था, जो खत्म हो गया? यह जल्दबाजी होगी। [Read more]


