परिचय

शशि शेखर
प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान

जन्मः वाराणसी, पत्रकारिता अनुभवः 29 साल। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग से स्नातकोत्तर। प्रिंट, टीवी और ऑनलाइन तीनों विधाओं में माहिर। हिन्दी दैनिक ‘आज’, ‘अमर उजाला’ और ‘आज तक’ टीवी चैनल में काम कर चुके हैं। वर्ष 1983 से ‘आजकल’ नामक स्तंभ लिख रहे हैं। फिलहाल हिन्दुस्तान अखबार समेत एचटी समूह के सभी हिन्दी प्रकाशनों व उनके ऑनलाइन संस्करणों के प्रधान संपादक।

पिछले महीने इलाहाबाद और बनारस की उन गलियों में फिर से घूमने का मौका मिला, जिनमें टहलते हुए मैंने बचपन से नौजवानी तक का रास्ता तय किया था। यकीनन बहुत-सी खट्टी-मीठी यादें थीं, जिन्हें मस्तिष्क में परत-दर-परत सहेजकर रखा था, पर यह सफर बुरी तरह झकझोर गया। [Read more]

बहुत पहले शेरों पर एक फिल्म देखी थी। वे जंगल में किस तरह रहते हैं, कैसे उनके शावक पैदा होते हैं, किस प्रकार से वे उनको पालते हैं, और यह देखना तो वाकई दिलचस्प था कि एक छोटे-से शावक को सिंहनी किस तरह से शिकार करना और उसे खाना सिखाती है? फिल्म का आखिरी हिस्सा बेहद मार्मिक था। [Read more]

रूस के ऐतिहासिक शहर येकतेरिनबर्ग में दोपहर ढल चली थी। पूरी दुनिया के टीवी चैनलों के कैमरे मंच पर रखी दो कुरसियों पर केंद्रित थे। कुछ ही क्षणों में भारतीय प्रधानमंत्री और पाकिस्तानी राष्ट्रपति वहां ‘फोटो ऑप’ के लिए आने वाले थे। [Read more]

देश के विभिन्न शहरों के दौरों के दौरान तमाम जाने-अनजाने लोगों से बात करने का मौका मिलता है। ये बातचीत अक्सर देश की बदहाली से शुरू होती है और गहन निराशा के तर्को के साथ खत्म हो जाती है। हर बार मेरे मन में सवाल उठता है कि क्या हालात वाकई इतने खराब हैं? क्या हम एक पतनशील देश हैं? [Read more]

श्रीसंत के बारे में सोच रहा हूं। तेज गेंदबाजी के साथ ठुमके लगाने में महारत रखने वाले इस नौजवान खिलाड़ी को जब भी देखता था, तो लगता था जैसे एक मासूम प्रतिभा ने अभी महज किरणें बिखेरनी शुरू की हैं। क्रिकेट के आकाश में उसे काफी देर और दूर तक चमकना है। उसका ऐसा पतन? क्या जरूरत थी इतना लालची बनने की? [Read more]