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	<title>Comments for सरे राह</title>
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	<description>Just another  weblog</description>
	<pubDate>Thu, 17 May 2012 13:34:36 +0000</pubDate>
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		<title>Comment on आवाज ही पहचान है by dev</title>
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		<dc:creator>dev</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Jul 2010 23:06:13 +0000</pubDate>
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		<description>राजेन्द्र जी आपका ब्लॉग को पढ़ा अच्छा लगा, बस सारी बात तो लिख नही पाउंगा, किसी शायर की चंद पंक्तिया याद आ रही हैं वही यहां पर कहना चाहता हूं।
सरे राह कुछ भी कहा नहीं, कभी उसके घर मैं गया नहीं
मैं जन्म-जन्म से उसी का हूं, उसे आज तक ये पता नहीं</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>राजेन्द्र जी आपका ब्लॉग को पढ़ा अच्छा लगा, बस सारी बात तो लिख नही पाउंगा, किसी शायर की चंद पंक्तिया याद आ रही हैं वही यहां पर कहना चाहता हूं।<br />
सरे राह कुछ भी कहा नहीं, कभी उसके घर मैं गया नहीं<br />
मैं जन्म-जन्म से उसी का हूं, उसे आज तक ये पता नहीं</p>
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		<title>Comment on बेचारे गीतकार! by Rajesh ojha</title>
		<link>http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/2010/02/26/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/#comment-23</link>
		<dc:creator>Rajesh ojha</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Jul 2010 11:22:12 +0000</pubDate>
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		<description>पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि यह आलेख किसी और राजेन्द्र जी का होगा; उस राजेन्द्र धोड़पकर का तो यह कतई नहीं हो सकता, जिसे हम सब अबतक पढ़ते-सुनते आ रहे हैं। शीर्षक के बाद के पहले पैरा तक तो मामला सही ही चल रहा था, लेकिन बाद के चीजों को पढ़ने के बाद, (बुरा न मानियेगा कद और पद दोनों में ही आप मुझसे बड़े हैं), ऐसा लगा कि ‘आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास’। हम प्रशंसकों पर रहम कीजिए। ‘रसगुल्ले’ की दावत में ‘चिनिया-बेदाम’ तो न दीजिए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि यह आलेख किसी और राजेन्द्र जी का होगा; उस राजेन्द्र धोड़पकर का तो यह कतई नहीं हो सकता, जिसे हम सब अबतक पढ़ते-सुनते आ रहे हैं। शीर्षक के बाद के पहले पैरा तक तो मामला सही ही चल रहा था, लेकिन बाद के चीजों को पढ़ने के बाद, (बुरा न मानियेगा कद और पद दोनों में ही आप मुझसे बड़े हैं), ऐसा लगा कि ‘आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास’। हम प्रशंसकों पर रहम कीजिए। ‘रसगुल्ले’ की दावत में ‘चिनिया-बेदाम’ तो न दीजिए।</p>
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	<item>
		<title>Comment on बेचारे गीतकार! by नीरज कुमार सिंह</title>
		<link>http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/2010/02/26/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/#comment-20</link>
		<dc:creator>नीरज कुमार सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 29 May 2010 13:51:49 +0000</pubDate>
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		<description>जनाब पत्रकारों की फितरत ही होती है कि हर क्षेत्र में, हर फन में माहिर और मौला हो किन्तु किसी भी क्षेत्र में अपने आप को विशेषज्ञ घोषित नहीं करे। मेरा तो मानना है कि वही सच्चे अर्थों में सही और प्रखर पत्रकार होता है, जो कि विनम्रता पूर्वक अपने परिचय में सरलता के साथ अपनी बातें सच-सच स्वीकार कर ले, इससे न सिर्फ उसके महान पत्रकार होने की झलक मिलती है, बल्कि सामान्य जिंदगी में सादा जीवन उच्च विचार वाली बात भी प्रमाणित होती है।

आपके ब्लॉग पर परिचय पढ़कर सहसा मैं अपने आप को रोक नहीं सका और बरबस ही मेरे मन में लिखने का विचार आया। इसी कारण मैंने कामेंट्स की शुरुआत ही उनके परिचय से करना चाहा।

इसके बाद मैं मुद्दे की बात आता हूं- श्रीमान्, मैं भी इस बात से सहमत हूं कि इस दुनिया में असली चीजें नकली घोषित कर दी जाती हैं और दुनिया के नकेल में नकली भी असली हो जाती है। इससे हटकर इस बात में तो और भी दम है कि जो बाजार में दिखता है, वही बिकता है और पर्दें के पीछे महान लोग, जो वस्तुतः किसी के निर्माता होते हैं वे भी दरकिनार कर दिए जाते हैं क्योंकि बाजार में तो यही थ्योरी चलती है कि जो दिखेगा वहीं बिकेगा।

वैसे महान गीतकारों को दुनिया भुलाती ही दिखती है, लेकिन समाज का एक वर्ग कम से कम इन्हें कभी समाज से विस्मृत होने नहीं देता, क्योंकि केवल बुद्धिजीवी ही उनके योगदान और दर्द को हमेशा समझ पाते हैं और उनके कार्यों को यदा-कदा लोगों के सामने रखकर उन्हें जीवंत बनाये रखने में काफी मददगार होते हैं। इस लेखनी के माध्यम से राजेंद्र जी ने भी कुछ वैसा ही किया है……</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जनाब पत्रकारों की फितरत ही होती है कि हर क्षेत्र में, हर फन में माहिर और मौला हो किन्तु किसी भी क्षेत्र में अपने आप को विशेषज्ञ घोषित नहीं करे। मेरा तो मानना है कि वही सच्चे अर्थों में सही और प्रखर पत्रकार होता है, जो कि विनम्रता पूर्वक अपने परिचय में सरलता के साथ अपनी बातें सच-सच स्वीकार कर ले, इससे न सिर्फ उसके महान पत्रकार होने की झलक मिलती है, बल्कि सामान्य जिंदगी में सादा जीवन उच्च विचार वाली बात भी प्रमाणित होती है।</p>
<p>आपके ब्लॉग पर परिचय पढ़कर सहसा मैं अपने आप को रोक नहीं सका और बरबस ही मेरे मन में लिखने का विचार आया। इसी कारण मैंने कामेंट्स की शुरुआत ही उनके परिचय से करना चाहा।</p>
<p>इसके बाद मैं मुद्दे की बात आता हूं- श्रीमान्, मैं भी इस बात से सहमत हूं कि इस दुनिया में असली चीजें नकली घोषित कर दी जाती हैं और दुनिया के नकेल में नकली भी असली हो जाती है। इससे हटकर इस बात में तो और भी दम है कि जो बाजार में दिखता है, वही बिकता है और पर्दें के पीछे महान लोग, जो वस्तुतः किसी के निर्माता होते हैं वे भी दरकिनार कर दिए जाते हैं क्योंकि बाजार में तो यही थ्योरी चलती है कि जो दिखेगा वहीं बिकेगा।</p>
<p>वैसे महान गीतकारों को दुनिया भुलाती ही दिखती है, लेकिन समाज का एक वर्ग कम से कम इन्हें कभी समाज से विस्मृत होने नहीं देता, क्योंकि केवल बुद्धिजीवी ही उनके योगदान और दर्द को हमेशा समझ पाते हैं और उनके कार्यों को यदा-कदा लोगों के सामने रखकर उन्हें जीवंत बनाये रखने में काफी मददगार होते हैं। इस लेखनी के माध्यम से राजेंद्र जी ने भी कुछ वैसा ही किया है……</p>
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	<item>
		<title>Comment on बेचारे गीतकार! by Dhiraj Jaiswal</title>
		<link>http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/2010/02/26/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/#comment-19</link>
		<dc:creator>Dhiraj Jaiswal</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 May 2010 11:15:08 +0000</pubDate>
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		<description>कई संगीतकारों ने लंबे-लंबे सफर किए, पर गुलजार की कलम आज भी दौड़ रही है, ये उनकी सोच और शब्दों का ही जादू है। वरना कितने संगीतकार आये, कितने कलाकार आए, चले गए जिनके साथ गुलजार ने काम किया। पर गुलजार लिखने वालों के लिए एक मिसाल की तरह आज भी अडिग खड़े हैं। पसंद करने वालों की उम्र में भी बड़ा फासला रहा पर सबने उन्हें सराहा। किस्सा मुख्तसर ये कि कलम की पतवार से ही चलती है कहानी की नाव पर जरा धीरे धीरे... फिल्म को तो सिर्फ घसीटा जा सकता है, बिना कहानी के...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कई संगीतकारों ने लंबे-लंबे सफर किए, पर गुलजार की कलम आज भी दौड़ रही है, ये उनकी सोच और शब्दों का ही जादू है। वरना कितने संगीतकार आये, कितने कलाकार आए, चले गए जिनके साथ गुलजार ने काम किया। पर गुलजार लिखने वालों के लिए एक मिसाल की तरह आज भी अडिग खड़े हैं। पसंद करने वालों की उम्र में भी बड़ा फासला रहा पर सबने उन्हें सराहा। किस्सा मुख्तसर ये कि कलम की पतवार से ही चलती है कहानी की नाव पर जरा धीरे धीरे&#8230; फिल्म को तो सिर्फ घसीटा जा सकता है, बिना कहानी के&#8230;</p>
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	<item>
		<title>Comment on बेचारे गीतकार! by anamika</title>
		<link>http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/2010/02/26/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/#comment-18</link>
		<dc:creator>anamika</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Mar 2010 15:23:56 +0000</pubDate>
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		<description>कोई भी अच्छे उत्पाद के पीछे कई प्रखर दिमाग का साथ होता है चाहे वह फिल्म निर्माण ही क्यों न हो।
आनंद बख्शी, कैफी आजमी, गुलजार, जां निसार अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी, राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, शंकर जयकिशन, शैलेन्द्र, ये कुछ नाम है जिनके बिना फिल्मोद्योग का कोई अस्तित्व ही नहीं है। बजाय खुद अपने नाम का डंका पीटने के दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए कि वो सफलता का श्रेय किसे देना चाहते है। दर्शक खुद जानकार हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कोई भी अच्छे उत्पाद के पीछे कई प्रखर दिमाग का साथ होता है चाहे वह फिल्म निर्माण ही क्यों न हो।<br />
आनंद बख्शी, कैफी आजमी, गुलजार, जां निसार अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी, राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, शंकर जयकिशन, शैलेन्द्र, ये कुछ नाम है जिनके बिना फिल्मोद्योग का कोई अस्तित्व ही नहीं है। बजाय खुद अपने नाम का डंका पीटने के दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए कि वो सफलता का श्रेय किसे देना चाहते है। दर्शक खुद जानकार हैं।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>Comment on बेचारे गीतकार! by s.k.sushant</title>
		<link>http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/2010/02/26/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/#comment-17</link>
		<dc:creator>s.k.sushant</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Mar 2010 10:54:00 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/?p=11#comment-17</guid>
		<description>यह सही है की कलम घिसने वालों की इज्ज़त न पहले थी और न ही आज है, आप रचनात्मत्कता के उत्कर्ष पर क्यों न हों आपकी वैल्यू कुछ नहीं है जब तक कोई उसे नाटक का साधन बनाकर लोगों के समक्ष पेश न कर दे। आमिर-अख्तर विवाद ने इस बात को स्थापित करने की कोशिश की है की गीतकार की इज्ज़त वहीं तक है कि कुछ घसीट दिया बस! आम जनता में उसका नाम लेने वाला कोई नहीं मिलता, कुछ पुब्लिसिटी संगीतकार उठाते हैं तो बाकि बची पब्लिसिटी पर डांस करने वाले हीरो हेरोइन लूट लेते हैं, आमिर खान का तर्क भी यही है कि अगर हम डांस करके उस गाने को न गायें तो लोग कैसे जानेंगे की जावेद अख्तर गाना भी लिखते हैं। ये तो सभी जानते हैं, की प्रेमचंद जैसे नामी लेखकों को भी बोम्बे से अपना बोरिया बिस्तर बांधने पड़े थे? उन्होंने कहा था की हम बाम्बे गए थे दूध बेचने लेकिन फिल्म वाले हमसे शराब बेचवाना चाहते थे। आज की स्थिति तो और भयानक है, स्क्रिप्ट लेखकों को, कहानीकारों को कलर्क की तरह आठ घंटे उन नाटककारों से नसीहत मिलती है जिसे हिंदी का ककहरा तक की समझ नहीं होती, वो आदेश देते हैं लेखकों को कि ऐसे लिखो वैसे लिखो। यानि एक साथ साहित्य, संस्कृति और लेखकों की बाजा बजा दो, और सचमुच आज देश का भी बाजा बजने में जुट गए हैं हमारे रचनाधर्मी नाटककार साथ दे रहे हैं आज के होनहार साहित्यकार, रोजी रोटी का जो सवाल है?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह सही है की कलम घिसने वालों की इज्ज़त न पहले थी और न ही आज है, आप रचनात्मत्कता के उत्कर्ष पर क्यों न हों आपकी वैल्यू कुछ नहीं है जब तक कोई उसे नाटक का साधन बनाकर लोगों के समक्ष पेश न कर दे। आमिर-अख्तर विवाद ने इस बात को स्थापित करने की कोशिश की है की गीतकार की इज्ज़त वहीं तक है कि कुछ घसीट दिया बस! आम जनता में उसका नाम लेने वाला कोई नहीं मिलता, कुछ पुब्लिसिटी संगीतकार उठाते हैं तो बाकि बची पब्लिसिटी पर डांस करने वाले हीरो हेरोइन लूट लेते हैं, आमिर खान का तर्क भी यही है कि अगर हम डांस करके उस गाने को न गायें तो लोग कैसे जानेंगे की जावेद अख्तर गाना भी लिखते हैं। ये तो सभी जानते हैं, की प्रेमचंद जैसे नामी लेखकों को भी बोम्बे से अपना बोरिया बिस्तर बांधने पड़े थे? उन्होंने कहा था की हम बाम्बे गए थे दूध बेचने लेकिन फिल्म वाले हमसे शराब बेचवाना चाहते थे। आज की स्थिति तो और भयानक है, स्क्रिप्ट लेखकों को, कहानीकारों को कलर्क की तरह आठ घंटे उन नाटककारों से नसीहत मिलती है जिसे हिंदी का ककहरा तक की समझ नहीं होती, वो आदेश देते हैं लेखकों को कि ऐसे लिखो वैसे लिखो। यानि एक साथ साहित्य, संस्कृति और लेखकों की बाजा बजा दो, और सचमुच आज देश का भी बाजा बजने में जुट गए हैं हमारे रचनाधर्मी नाटककार साथ दे रहे हैं आज के होनहार साहित्यकार, रोजी रोटी का जो सवाल है?</p>
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	</item>
	<item>
		<title>Comment on बेचारे गीतकार! by Shabbir</title>
		<link>http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/2010/02/26/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/#comment-16</link>
		<dc:creator>Shabbir</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Mar 2010 14:23:56 +0000</pubDate>
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		<description>लेख काफी अच्छा है, मेरे विचार इस मामले में आपसे काफी मिलते जुलते हैं। साहिर, शैलेन्द्र जैसे काव्यात्मक गीतकारों के साथ संगीतकारों ने जैसे गीत बनाए वैसे गीत शुद्ध फ़िल्मी गीतकारों के साथ नहीं बन पाए। पर लेख का विषय था - गीतकारों को गीत की सफलता का कितना श्रेय मिलता है, जिसे आपने लेख में लगभग अनदेखा कर दिया। मैं मानता हूं कि साहिर, गुलज़ार व योगेश जैसे गीतकारों के गीतों को अलग से ही पहचाना जा सकता है। साहिर के शब्द चयन ही इतने अलग थे, कि उनके गीत अलग से पहचाने जा सकते हैं। मैंने जो गीत जीवन में नहीं सुना हो, पहली बार भी सुनूं तो बता सकता हूं कि यह गीत साहिर का है। उन्होंने कभी कभी, जोशीला जैसे फिल्मों के लिए जो सबसे साधारण गीत लिखे, उन्हें भी हम साधारण नहीं कह सकते। ऐसे गीतकारों की कमी नहीं है, बल्कि आज फ़िल्मी दुनिया को ऐसे गीतकारों की ज़रूरत ही नहीं है, क्योंकि गीतों को समझने, उनकी भावनाओं तन जाने की किसी को फुर्सत नहीं है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लेख काफी अच्छा है, मेरे विचार इस मामले में आपसे काफी मिलते जुलते हैं। साहिर, शैलेन्द्र जैसे काव्यात्मक गीतकारों के साथ संगीतकारों ने जैसे गीत बनाए वैसे गीत शुद्ध फ़िल्मी गीतकारों के साथ नहीं बन पाए। पर लेख का विषय था - गीतकारों को गीत की सफलता का कितना श्रेय मिलता है, जिसे आपने लेख में लगभग अनदेखा कर दिया। मैं मानता हूं कि साहिर, गुलज़ार व योगेश जैसे गीतकारों के गीतों को अलग से ही पहचाना जा सकता है। साहिर के शब्द चयन ही इतने अलग थे, कि उनके गीत अलग से पहचाने जा सकते हैं। मैंने जो गीत जीवन में नहीं सुना हो, पहली बार भी सुनूं तो बता सकता हूं कि यह गीत साहिर का है। उन्होंने कभी कभी, जोशीला जैसे फिल्मों के लिए जो सबसे साधारण गीत लिखे, उन्हें भी हम साधारण नहीं कह सकते। ऐसे गीतकारों की कमी नहीं है, बल्कि आज फ़िल्मी दुनिया को ऐसे गीतकारों की ज़रूरत ही नहीं है, क्योंकि गीतों को समझने, उनकी भावनाओं तन जाने की किसी को फुर्सत नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>Comment on आवाज ही पहचान है by Dhruv Rautela</title>
		<link>http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/2009/11/13/%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%88/#comment-15</link>
		<dc:creator>Dhruv Rautela</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Feb 2010 10:54:21 +0000</pubDate>
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		<description>आपके कार्टूनों का दीवाना हूं। बाला साहब ठाकरे भी सुना कार्टूनिस्ट थे अब धर्म बेचने में जुट गए। आप लाजवाब है आपकी पेंसिल काफी कुछ बोलती है।
ध्रुव रौतेला, जी न्यूज़, नैनीताल</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके कार्टूनों का दीवाना हूं। बाला साहब ठाकरे भी सुना कार्टूनिस्ट थे अब धर्म बेचने में जुट गए। आप लाजवाब है आपकी पेंसिल काफी कुछ बोलती है।<br />
ध्रुव रौतेला, जी न्यूज़, नैनीताल</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>Comment on आवाज ही पहचान है by Nisha</title>
		<link>http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/2009/11/13/%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%88/#comment-14</link>
		<dc:creator>Nisha</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 Feb 2010 03:44:01 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/?p=7#comment-14</guid>
		<description>नमस्कार सर...
आपके लेखों को काफी लम्बे समय से पढ़ रही हूं... और प्रभावित होती रही हूं। आप का नजरिया भीड़ से अलग लगता है शायद वही आपके लेखों को सबसे अलग करता है... और यूं ही लिखते रहिये ताकि हम जैसे अनुज आप से कुछ सीख पायें...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>नमस्कार सर&#8230;<br />
आपके लेखों को काफी लम्बे समय से पढ़ रही हूं&#8230; और प्रभावित होती रही हूं। आप का नजरिया भीड़ से अलग लगता है शायद वही आपके लेखों को सबसे अलग करता है&#8230; और यूं ही लिखते रहिये ताकि हम जैसे अनुज आप से कुछ सीख पायें&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>Comment on आवाज ही पहचान है by abhimanyu tyagi</title>
		<link>http://blogs.livehindustan.com/sare-raah/2009/11/13/%e0%a4%86%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%88/#comment-13</link>
		<dc:creator>abhimanyu tyagi</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Jan 2010 19:02:32 +0000</pubDate>
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		<description>no comments</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>no comments</p>
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