परिचय
प्रमोद जोशी
व्यावसायिक पत्रकारिता में 1973 से। लखनऊ के दैनिक स्वतंत्र भारत में काम करने का मौका मिला। उसके पहले छात्र जीवन से कार्टून बनाने की शुरूआत की। लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के पोस्ट ग्रेजुएट छात्र के रूप में कई रंगत के विचारों से परिचय हुआ। उन दिनों एक ओर नक्सली आंदोलन चल रहा था और दूसरी ओर गरीबी हटाओ के नारे के साथ इंदिरा गांधी महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभर कर सामने आईं थीं। बांग्लादेश के नाम से एक नया देश उन्हीं दिनों बना था। वियतनाम से अमेरिका के पलायन का वह दौर था। गुजरात और बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन शुरू हुए। पंजाब में 1973 में आनन्दपुर साहब प्रस्ताव पास हुआ। 1975 में आपातकाल लागू हुआ वगैरह-वगैरह। गर्ज यह कि सांसारिक उखाड़-पछाड़ के जिस जबर्दस्त दौर के साथ शुरूआत की वह जारी है। हिन्दी पत्रकारिता के रूपांकन और सामग्री के लिहाज से 1977 का परिवर्तनकारी उत्तर आपत्काल युग भी देखने को मिला। इन सब बातों और प्रेरणा देने वाले इंसानों से एक बात सीख पाया कि हर तस्वीर का व्यापक पहलू होता है। कई बार वह दिखाई नहीं पड़ता। उसे देखने की कोशिश करो।
अभिनव बिन्द्रा खाते-पीते घर के हैं। उन्हें सरकारी मदद न मिले फिर भी वे चैम्पियन बनने लायक साधन जुटा सकते हैं। पर वे भी परेशान हैं। उन्हें लगता है कि देश की खेल व्यवस्था में कोई दोष है। जिन दिनों हॉकी खिलाड़ियों की बगावत हवा में थी उन दिनों राष्ट्रीय रायफल एसोसिएशन भी विवादों से घिरी थी। एक तो बाहर से शूटिंग उपकरण मंगाने के कारण करीब 8.5 करोड़ के टैक्स का मामला था दूसरे डबल ट्रैप शूटिंग के दुबारा ट्रायल का मामला उठा। [Read more]
Posted by admin on Saturday, January 16, 2010 at 5:12 am
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हमारे देश में हर रोज़ पर्व होता है। हम हर दिन सेलिब्रेट कर सकते हैं, बल्कि करते हैं। सचिन तेन्दुलकर के टेस्ट क्रिकेट प्रवेश के 20 वर्ष पूरे होना वास्तव में महान उपलब्धि है। सचिन असाधारण खिलाड़ी हैं। पर क्या रणजी, दिलीप सिंहजी, सीके नायडू वगैरह भी असाधारण नहीं थे? हमने उनके 20 साल नहीं मनाए। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की जन्मशती 2005 में क्या हमने मनाई। [Read more]
Posted by admin on Monday, November 16, 2009 at 11:50 pm
Filed under Uncategorized · Tagged आयतुल्ला खुमैनी, चेकोस्लोवाकिया, जर्मनी, जॉर्ज बुश, दिलीप सिंह, ध्यानचंद, बलगारिया, यूरोप, रणजी, रूमानिया, रोनाल्ड रेगन, सचिन तेंदुलकर, सीके नायडू, सोवियत संघ, हंगरी
हज़ारों या लाखों साल पहले किसी के दिमाग शायद यह बात आई हो कि दूर से जो नज़र आ रहा है, वह पास से कैसा लगेगा। या शायद न आई हो। वहरहाल उन्होंने दूरबीन बना ली। दूर की देखने भी लगे। इस दूर का स्पेस के अलावा टाइम से भी रिश्ता है। पास का वक्त और दूर का वक्त। हाल का वक्त तो दीखता है, दूर का नहीं दीखता। गुज़रा या आने वाला वक्त नज़र नहीं आता। [Read more]
Posted by admin on Friday, November 13, 2009 at 4:02 am
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